मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु को किस वरदान से हुई थी पुत्र की प्राप्ति, जानें इसके पीछे की दिलचस्प कथा
भारतीय पौराणिक कथाओं में अनेक देवी-देवताओं और उनके लीलाओं का वर्णन मिलता है. इन्हीं में से एक है भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी के पुत्र एकवीर की कथा. यह कथा जितनी रोचक है उतनी ही प्रेरणादायक भी है. भगवान विष्णु ने किसी कारणवश अपनी प्रिय पत्नी लक्ष्मी को घोड़ी होने का श्राप दे दिया था. श्राप के कारण मां लक्ष्मी को अश्व रूप में पृथ्वी पर रहना पड़ा. इस दौरान उन्होंने भगवान शिव की आराधना की. आइए जानते हैं इस कथा के बारे में…
श्राप और जन्म
देवी भागवत पुराण के अनुसार एक समय भगवान विष्णु ने किसी कारणवश अपनी प्रिय पत्नी लक्ष्मी को श्राप दे दिया था. श्राप के कारण मां लक्ष्मी को अश्व रूप में पृथ्वी पर रहना पड़ा. इस दौरान उन्होंने भगवान शिव की आराधना की. भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे फिर से भगवान विष्णु के पास लौटेंगी और उनसे पुत्र प्राप्त करेंगी.
समय आने पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का मिलन हुआ और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, जिनका नाम एकवीर रखा गया. कुछ कथाओं में यह भी वर्णन है कि एकवीर का जन्म यमुना और तमसा नदी के संगम पर हुआ था.
राजा हरिवर्मा द्वारा पालन-पोषण
एक अन्य कथा के अनुसार जब एकवीर का जन्म हुआ तो भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी उन्हें जंगल में ही छोड़कर चले गए. उसी समय राजा हरिवर्मा नामक एक धर्मात्मा राजा जो संतान प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की तपस्या कर रहे थे. भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि वे एकवीर को अपना पुत्र मानकर ले. राजा हरिवर्मा जंगल गए और उन्होंने एकवीर को पाया. वे उन्हें अपनी राजधानी ले गए और उनका पालन-पोषण अपने पुत्र की तरह किया.
एकवीर का विवाह और राज्याभिषेक
राजा हरिवर्मा ने एकवीर को सभी प्रकार की शिक्षाएं दीं और जब वे बड़े हुए तो उनका विवाह राजा रैभ्य की पुत्री यशोमती से कराया गया. इसके बाद राजा हरिवर्मा, एकवीर को राजा बनाकर स्वयं वन में तपस्या करने चले गए.
यह कथा विभिन्न पुराणों और लोक कथाओं में भिन्न-भिन्न रूपों में पाई जाती है, लेकिन इसका मूल संदेश यही है कि भगवान की कृपा सदैव अपने भक्तों पर बनी रहती है.

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