संविधान की प्रति में चित्रों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में हुई तीखी बहस
सभापति ने कहा-मूल प्रति में 22 चित्र थे, जो भारत की संस्कृति को दर्शाते हैं
नई दिल्ली। राज्यसभा में संविधान की प्रति में चित्रों की गैरमौजूदगी को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। बीजेपी सांसद आरएमडी अग्रवाल ने कहा कि बाजार में उपलब्ध संविधान की प्रतियों में रामायण, महाभारत और भारतीय इतिहास से जुड़े चित्र नहीं हैं, जबकि ये मूल पाठ का हिस्सा थे। मंगलवार को आरएमडी अग्रवाल ने विशेष उल्लेख के दौरान कहा कि संविधान की मूल प्रति में भगवान राम, लक्ष्मण, सीता, अर्जुन को गीता का उपदेश देते भगवान कृष्ण, महात्मा गांधी, रानी लक्ष्मीबाई, शिवाजी और अन्य के चित्र शामिल थे, लेकिन अब प्रकाशित हो रही प्रतियों में ये चित्र नहीं हैं।
इस पर विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने संविधान को अनावश्यक विवाद में घसीटने का प्रयास बताया और आरोप लगाया कि यह डॉ. भीमराव अंबेडकर की छवि को धूमिल करने का प्रयास है। खड़गे ने पूछा कि ये चित्र कहां हैं? क्या आपने कभी संविधान की मूल प्रति में इसे देखा है? सभापति जगदीप धनखड़ ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि संविधान की मूल प्रति में 22 चित्र थे, जो भारत की 5000 साल पुरानी सांस्कृतिक यात्रा को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि इन चित्रों को शामिल न करना अपमानजनक होगा।
वहीं बीजेपी के राज्यसभा नेता जेपी नड्डा ने सदन में कहा कि सदस्य ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि सरकार संविधान से जुड़ी भावनाओं का सम्मान करेगी और उचित कदम उठाएगी। नड्डा ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे इसे राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं, जबकि अग्रवाल ने अंबेडकर को लेकर कुछ भी गलत नहीं कहा। विपक्षी सांसदों ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाते हुए सदन में हंगामा किया। तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओब्रायन ने कहा कि उनके आईपैड में संविधान की 404 पन्नों की प्रति है, जिसमें भी चित्र नहीं हैं, तो क्या इसे भी अवैध माना जाएगा?
संविधान की मूल प्रति जब संविधान 1950 में अपनाया गया था, तब उसकी हस्तलिखित मूल प्रति में भारतीय संस्कृति को दर्शाने वाले कई चित्र शामिल थे, जिन्हें मशहूर कलाकार नंदलाल बोस और उनके सहयोगियों ने बनाया था। वर्तमान प्रतियां संविधान की मुद्रित प्रतियों में आमतौर पर ये चित्र नहीं होते, क्योंकि वे केवल मूल हस्तलिखित संस्करण में मौजूद थे। विपक्ष का कहना है कि संविधान का मुख्य उद्देश्य उसके प्रावधान और अधिकार हैं, न कि चित्र, जबकि बीजेपी इसे संस्कृति और विरासत से जोड़ रही है। सरकार ने संविधान की मूल प्रति में मौजूद चित्रों को वापस लाने पर विचार करने की बात कही है, लेकिन विपक्ष इसे अनावश्यक विवाद बता रहा है। देखना होगा कि क्या इस बहस का कोई नया कानूनी या आधिकारिक असर पड़ता है या यह महज राजनीतिक मुद्दा बनकर रह जाएगा।

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